जल संरक्षण हेतु राज्यों को सहायता

National news

(नई दिल्ली)24मार्च,2026.

‘जल’ के राज्य का विषय होने के कारण, जल संसाधनों से संबंधित पहलु-जिनमें इसका संरक्षण भी शामिल है-का अध्ययन, योजना बनाना, वित्तपोषण और कार्यान्वयन राज्य सरकारों द्वारा उनके अपने संसाधनों और प्राथमिकताओं के अनुसार किया जाता है। केंद्र सरकार, राज्य सरकारों द्वारा किए जा रहे उपायों और प्रयासों में सहयोग प्रदान करती है।

“जल संचय जन भागीदारी” (जेएसजेबी) पहल को 6 सितंबर 2024 को सूरत, गुजरात में जेएसए: सीटीआर अभियान को और मजबूत करने के लिए शुरू किया गया था। जेएसजेबी पहल का उद्देश्य कम लागत और सैच्यूरेशन मोड़ में कम लागत वाली वर्षा जल संचयन संरचनाओं के निर्माण के लिए सामुदायिक कार्रवाई और भागीदारी को तेज करना है। यह पहल कम लागत वाली संरचनाओं जैसे कि बोरवेल, रिचार्ज शाफ्ट, रिचार्ज पिट के निर्माण के लिए सामुदायिक फंड, व्यक्तिगत दान, कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व निधि और अन्य का उपयोग करती है, जिसमें स्थानीय रूप से उपलब्ध सामग्री का उपयोग किया जाता है, ताकि वर्षा जल का संचयन किया जा सके, भूमिगत जल स्तर को बढ़ाया जा सके और जल से संबंधित समस्याओं का स्थानीय रूप से अनुकूल समाधान किया जा सके।

यह पहल महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा), अटल नवीकरण और शहरी परिवर्तन मिशन (अमृत), पर ड्रॉप मोर क्रॉप, प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (पीएमकेएसवाई) के तहत मरम्मत, नवीनीकरण और पुनरूद्धार घटक, प्रतिपूरक वनीकरण कोष प्रबंधन और योजना प्राधिकरण (केम्पा) और वित्त आयोग अनुदान जैसी केंद्र, राज्य और स्थानीय निकायों की विभिन्न योजनाओं से समन्वित वित्तपोषण पर बल देता है।

राज्यों और स्थानीय निकायों द्वारा विशेष रूप से जल की कमी वाले क्षेत्रों में वर्षा जल संचयन प्रणालियों को लागू करने में आने वाली चुनौतियों के समाधान हेतु भारत सरकार ने एक व्यापक और बहुआयामी दृष्टिकोण अपनाया है। इस रणनीति के अंतर्गत, केंद्रीय भूमि जल बोर्ड (सीजीडब्ल्यूबी) और केंद्रीय जल आयोग (सीडब्ल्यूसी) के सेंट्रल मिनिस्ट्रियल नोडल ऑफिसर्स (सीएमएनओ) को तकनीकी मार्गदर्शन प्रदान करने और जल संरक्षण संरचनाओं का सत्यापन करने के लिए नियुक्त किया गया है। इसके अतिरिक्त, सभी राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों द्वारा राज्य स्तर पर इस पहल के कार्यान्वयन की निगरानी के लिए राज्य नोडल अधिकारियों की नियुक्ति भी की गई है।

राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना (एनआरसीपी) के तहत, गंगा बेसिन और उसकी सहायक नदियों के अलावा देश में नदियों के चिन्हित प्रदूषित खंडों में प्रदूषण को कम करने के लिए वित्तीय और तकनीकी सहायता प्रदान की जाती है। एन आर सी पी ने रॉ सीवेज के इंटरसेप्शन और डायवर्जन, सीवरेज प्रणाली के निर्माण, सीवेज उपचार संयंत्रों की स्थापना, कम लागत वाली स्वच्छता, नदी तट/बाथिंग घाट विकास से संबंधित विभिन्न प्रदूषण कम करने संबंधी कार्य किए हैं। प्रदूषित नदी खंडों के साथ-साथ कस्बों में प्रदूषण कम करने संबंधी कार्यों के प्रस्ताव एनआरसीपी के विचार के लिए समय-समय पर राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों से प्राप्त किए जाते हैं और उनकी प्राथमिकता एनआरसीपी दिशानिर्देशों के अनुपालन, धन की उपलब्धता के आधार पर मंजूर किए जाते हैं। एनआरसीपी ने 8970.51 करोड़ रुपये की कुल स्वीकृत लागत 17 राज्यों में फैले 100 शहरों की 58 नदियों को कवर किया है और 3019 मिलियन लीटर प्रतिदिन (एमएलडी) की सीवेज उपचार क्षमता सृजित की गई है।

‘नदी बेसिन प्रबंधन (आरबीएम) – ब्रह्मपुत्र बोर्ड’ के तहत, एडवाइजरी और क्षमता निर्माण सहायता के साथ-साथ चुनिंदा बाढ़ प्रबंधन, कटाव नियंत्रण, जल निकासी और स्प्रिंग्सशेड प्रबंधन कार्यों की योजना, डीपीआर तैयार करना, सर्वेक्षण और निष्पादन सहित राज्यों को तकनीकी और सीमित वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है।

नमामि गंगे कार्यक्रम के तहत गंगा नदी और उसकी सहायक नदियों के संरक्षण के लिए अपशिष्ट जल उपचार, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन, नदी फ्रंट प्रबंधन (घाट और शमशान घाट विकास), ई-फ्लो, वनीकरण, जैव विविधता संरक्षण और जन भागीदारी जैसे व्यापक उपाय किए गए हैं।

जल जीवन मिशन के तहत, केंद्र और राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों (केन्द्रीय हिस्सा: राज्य हिस्सा) के बीच फंड साझा करने का पैटर्न बिना विधायिका के संघ राज्य क्षेत्रों के लिए 100:00, पूर्वोत्तर और हिमालयी राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रों के लिए 90:10 और शेष राज्यों के लिए 50:50 है। इसके अलावा, सहायता और जल गुणवत्ता निगरानी प्रणाली (डब्ल्यूक्यूएमएस) गतिविधियों के तहत संघ राज्य क्षेत्रों के लिए वित्तपोषण पैटर्न 100:00, हिमालयी और पूर्वोत्तर राज्यों के लिए 90:10 और अन्य राज्यों के लिए 60:40 है।

सतही लघु सिंचाई (एसएमआई) और जल निकायों की योजनाओं की मरम्‍मत, नवीकरण और पुनरूद्धार (आरआरआर) के तहत केन्‍द्रीय सहायता (सीए) अनुदान के रूप में प्रदान की जाती है जो बिना विधायिका के संघ राज्य क्षेत्रों के लिए परियोजना लागत का 100 प्रतिशत है। विधायिका युक्त संघ राज्य क्षेत्रों और 7 पूर्वोत्तर राज्यों और सिक्किम और पहाड़ी राज्यों (हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड) के लिए परियोजना लागत का 90% केंद्रीय सहायता है। इसके अलावा, एसएमआई योजना के तहत केन्‍द्रीय सहायता/अनुदान विशेष क्षेत्रों को लाभ पहुंचाने वाली परियोजनाओं के लिए परियोजना लागत का 60 प्रतिशत है, जिसमें ओडिशा के अविभाजित कोरापुट, बोलंगीर और कालाहांडी (केबीके) जिले, उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र और महाराष्ट्र के मध्य प्रदेश, मराठवाड़ा और विदर्भ क्षेत्र, वामपंथी उग्रवाद प्रभावित क्षेत्र, जनजातीय क्षेत्र, बाढ़ प्रवण क्षेत्र, डीपीएपी (सूखा प्रवण क्षेत्र कार्यक्रम) क्षेत्र, अन्य राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों के रेगिस्तान विकास कार्यक्रम (डीडीपी) क्षेत्र शामिल है। डब्ल्यूबी के आरआरआर योजना के तहत केंद्रीय सहायता अन्य सभी श्रेणी के लिए परियोजना लागत का 60 प्रतिशत है।

प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना 2.0 (डब्ल्यूडीसी-पीएमकेएसवाई 2.0) के वाटरशेड विकास घटक के तहत दिशानिर्देश, क्षमता निर्माण और भू-स्थानिक निगरानी के माध्यम से तकनीकी सहायता सहित वित्तीय सहायता 60:40 (समतल राज्यों), 90:10 (उत्तर-पूर्व/हिमालय राज्यों) और 100 प्रतिशत संघ राज्य क्षेत्रों को साझा की जाती है।

विभिन्न योजनाओं के तहत निधियों के आवंटन के लिए उपयोग किए जाने वाले मापदंडों में, अन्य बातों के साथ-साथ, कार्यों की प्राथमिकता और तात्कालिकता, विशेष रूप से बाढ़-प्रवण और कटाव प्रभावित क्षेत्रों में; राज्य सरकारों से प्राप्त अनुरोध और प्रस्ताव; संभावित लाभ की सीमा, जैसे जीवन, संपत्ति, अवसंरचना और कृषि भूमि की रक्षा; पिछला कार्य-निष्पादन, जिसमें चल रही परियोजनाओं की प्रगति और उपयोग प्रमाण पत्रों का प्रस्तुत करना शामिल है; और व्यय विभाग, वित्त मंत्रालय द्वारा जारी दिशानिर्देश/निर्देश शामिल हैं।

जल संचय जन भागीदारी (जेएसजेबी) पहल के तहत, आवासन और शहरी कार्य मंत्रालय के सहयोग से, जल संरक्षण के क्षेत्र में दिए गए योगदान को मान्यता देने के लिए एक प्रोत्साहन योजना शुरू की गई है, जिसके तहत इस योजना से जुड़े विभिन्न श्रेणियों के योगदानकर्ताओं को शामिल किया गया है, जिनमें सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाले राज्य/संघ राज्य क्षेत्रों, ज़िले, नगर निगम, यूएलबी, सहयोगी मंत्रालय/विभाग, उद्योग, एनजीओ, परोपकारी व्यक्ति और नोडल अधिकारी शामिल हैं। योजना के अनुसार, प्रोत्साहन राशि केवल जल संरक्षण संरचनाओं और जल संरक्षण जागरूकता गतिविधियों के लिए निर्धारित है, जिसमें हितधारकों की क्षमता निर्माण भी शामिल है। ‘नमामि गंगे कार्यक्रम’ के अंतर्गत, परियोजनाओं को समय से पहले पूरा करने के लिए ‘हाइब्रिड वार्षिकी मोड’ (हायब्रिड एन्यूटि मोड) के तहत प्रोत्साहन प्रदान किए जाते हैं।

निधि के इस्तेमाल में पारदर्शिता और जवाबदेही कई तरीकों से सुनिश्चित की जाती है, जिनमें निधि जारी करने/इस्तेमाल करने के लिए पीएफएमएस को अनिवार्य बनाना; सामान्य वित्तीय नियमों (जीएफआर-2017) का पालन करना; भौतिक और वित्तीय प्रगति की रियल-टाइम ट्रैकिंग के लिए ऑनलाइन मॉनिटरिंग सिस्टम (एमआईएस) का इस्तेमाल; और वित्त मंत्रालय के निर्धारित नियमों के अनुसार उपयोग प्रमाण पत्र और ऑडिट किए गए खाते जमा करना शामिल हैं।

यह सूचना जल शक्ति राज्यमंत्री श्री राज भूषण चौधरी द्वारा राज्यसभा में लिखित प्रश्न के उत्तर में प्रदान की गई है।(साभार एजेंसी)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *