मसूरी में आयोजित प्रेसवार्ता में उत्तराखण्ड फिल्म टेलीविजन एण्ड रेडियो एसोसिएशन (उफतारा) ने राज्य के फिल्म उद्योग की बिगड़ती स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त की। संगठन का कहना है कि उत्तराखंड का फिल्म उद्योग आज समाप्ति की कगार पर पहुंच चुका है।
उफतारा के अध्यक्ष प्रदीप भण्डारी ने कहा कि पिछले 10 वर्षों से फिल्म बोर्ड का गठन लंबित है, जिससे फिल्म क्षेत्र में योजनाबद्ध विकास नहीं हो पा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि हर वर्ष दिए जाने वाले 50 लाख रुपये से अधिक के फिल्म पुरस्कार विभाग स्तर पर ही अटके हुए हैं। साथ ही, उत्तराखण्ड फिल्म विकास परिषद द्वारा क्षेत्रीय फिल्म निर्माताओं के तय अनुदान में 25 प्रतिशत से अधिक कटौती कर उनका शोषण किया जा रहा है।
🎥 नीति बनी, लेकिन जमीनी लाभ नहीं: महासचिव
महासचिव कान्ता प्रसाद ने कहा कि राज्य सरकार द्वारा बनाई गई फिल्म नीति सराहनीय है, लेकिन उसका वास्तविक लाभ क्षेत्रीय फिल्म उद्योग को नहीं मिल पा रहा है। उन्होंने चिंता जताई कि आंचलिक भाषाओं का सिनेमा लगातार घट रहा है और सिनेमा हॉल में दर्शकों की संख्या भी बेहद कम हो गई है। उन्होंने फिल्म बोर्ड के गठन को अत्यंत आवश्यक बताया।
🎭 लोक कलाकारों की स्थिति भी गंभीर
उफतारा के वरिष्ठ उपाध्यक्ष डा० अमरदेव गोदियाल ने लोक कलाकारों की दयनीय स्थिति पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि वर्तमान में लोकनृत्य कलाकारों को एक कार्यक्रम के लिए मात्र ₹800 मानदेय दिया जाता है, जबकि महंगाई को देखते हुए इसे कम से कम ₹2000 किया जाना चाहिए। साथ ही, कलाकारों को समय पर भुगतान नहीं मिलता और कई बुजुर्ग कलाकारों की पेंशन 95 वर्ष की आयु तक भी शुरू नहीं हो पाई है।
📢 सरकार से की गई प्रमुख मांगें
- शीघ्र फिल्म बोर्ड का गठन
- रुके हुए फिल्म पुरस्कारों का वितरण
- अनुदान में कटौती पर रोक
- लोक कलाकारों का मानदेय बढ़ाया जाए
- लंबित पेंशन मामलों का तत्काल निस्तारण
प्रेसवार्ता में अध्यक्ष प्रदीप भण्डारी, महासचिव कान्ता प्रसाद, प्रचार सचिव नागेन्द्र प्रसाद, वरिष्ठ उपाध्यक्ष डा० अमरदेव गोदियाल, कोषाध्यक्ष प्रमोद बेलवाल, सहसचिव नन्दन सिंह कण्डारी, सलाहकार संयोजक जसपंवार जस्सी एवं श्रीमती कमलेश भण्डारी सहित कई पदाधिकारी उपस्थित रहे।